रामावतार स्वर्णकार
इचाक । बरकट्ठा विधान सभा क्षेत्र के सभी प्रखंडों में बारीश की कमी के कारण प्रदेश की प्रमुख फसल धान का रोपा नही हो पाया है। इसके अलावा भदई फसल को भी काफ़ी नुक्सान पहुंचा है। कहीं कहीं किसानों ने सिंचाई कर रोपा किया लेकिन बारिश नहीं होने के कारण वह भी मरने के कगार पर है। ऐसे में कर्ज लेकर महंगे बीज, यूरिया और मजदूरी में खर्च कर किसान बेहाल है। किसानों के सामने घोर आर्थिक संकट खड़ी हो गई है। उक्त बातें बरकट्ठा विधान सभा क्षेत्र के पूर्व विधायक जानकी प्रसाद यादव ने सोमवार को प्रखंड का दौरा करने के क्रम में पत्रकारों से कही। उन्होने कहा कि झारखंड सरकार बरकट्ठा विधान सभा समेत पुरे राज्य को अकाल क्षेत्र घोषित करते हुए जरूरी राहत कार्य शुरू करे और नदी, नाले और चेकडैम के जल को संरक्षित करने हेतू जरूरी कदम उठाएं। उन्होने राज्य के किसानों की दुर्दशा पर चिन्ता व्यक्त करते हुए हेमंत सरकार पर जमकर अपनी भड़ास निकाली।

कहा कि पिछ्ले वर्ष भी क्षेत्र को सुखाड़ घोषित किया गया था। लेकिन अभी तक किसानों को फसल बीमा और सुखाड़ राहत की राशि नहीं मिल पाना किसानों के प्रति राज्य सरकार की ओछी मानसिकता को दर्शाता है। उन्होने कहा कि झारखंड एक कृषि प्रधान राज्य है। लेकिन प्रदेश में अभी तक सिंचाई की कोई समुचित व्यवस्था नहीं हो पाई है। सरकार राज्य के सारे इंफ्रास्ट्रक्चर को बंद कर कुछ दिनों तक किसानों के हित में काम करे। सिंचाई की जरूरी सुविधा बहाल करे। बापू ने कहा था कि भारत गांवों का देश है। जब तक गांव खुशहाल नहीं होगा तब तक समृद्ध भारत की परिकल्पना नहीं की जा सकती। उन्होने आगे कहा कि विगत कई वर्षों से विस क्षेत्र के इचाक, टाटी झरिया, बरकट्ठा, चालकुशा समेत कई प्रखंडों में हाथियों का तांडव जारी है। जिससे वन क्षेत्र से सटे गांव में रहनेवाले गरीब और निर्धन किसानो को काफ़ी नुकसान पहुंचा है। सरकार वन विभाग हाथियों को अन्यत्र भगाने और पीड़ित किसानो को सम्मान पूर्ण मुआवाजा दिलाए। अन्यथा विशाल जन आंदोलन को बाध्य होंगे। उन्होने क्षेत्र में मनरेगा अधिनियम पर व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी जमकर निशाना साधते हुए मनरेगा अधिनियम को “मनीरेगा” करार दिया। कहा कि मनरेगा मजदूरों को रोजगार मुहैया कराने के लिए एक अधिनियम बना था। ताकि किसी भी मजदुर को वर्ष में कम से कम 180 दिन रोजगार मिले। लेकिन मनरेगा का सभी काम धड़ल्ले से मशीन से कराया जा रहा है। और सम्बन्धित अधिकारी मूकदर्शक बनी रहती है।

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