झरिया । शनिवार की सुबह धनसार-झरिया मुख्य मार्ग पर बस्ताकोला पेट्रोल पंप के पास एक ऐसी खबर फैली, जिसने हर किसी का दिल तोड़ दिया। सड़क के किनारे पड़ा एक नवजात शिशु… ठंडी, निर्जीव, और पूरी तरह अकेला। स्थानीय लोगों का ध्यान पहले कुछ आवारा कुत्तों के झुंड पर गया। जो उस जगह इकट्ठा हो रहे थे। जैसे ही किसी ने पास जाकर देखा, तो सन्न रह गया। एक छोटा-सा लड़का, नवजात, बिना कपड़े के लिपटा हुआ, लेकिन अब सांसों से रहित।
यह दृश्य इतना मार्मिक था कि वहां खड़े हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। लोग चीख-चीखकर मातृत्व की दुहाई देने लगे। लोग कहते रहे कौन मां होगी जो अपने बच्चे को ऐसे कुड़े मे फेंक गई। क्या इतना भी दिल नहीं था कि कम से कम किसी के हाथों में सौंप देती।जिस मां ने नौ माह अपने कोख मे रखा उस मां को इसपर दया भी नहीं आई। आखिर किस सिने मे दफन हो गई थी उसकी ममता। बच्चा मरा हो या जिंदा, इस हाल मे बिना कपड़े के फेकने मे उसका हृदय तक नहीं कांपा।आखिर कहां गई थी ऐसी मां की मातृत्व। इधर सूचना मिलते ही झरिया पुलिस मौके पर पहुंची। अधिकारियों ने बच्चे का पंचनामा किया और सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार करवाया। लेकिन सवाल अब भी वही हैं जो सदियों से पूछे जाते रहे हैं। आखिर क्यों? क्यों एक नन्हा जान इस दुनिया में पूरी तरह आया ही नहीं और अगर आया तो उसे इतनी बेरुखी क्यों मिली?यह घटना सिर्फ एक बच्चे की मौत नहीं है। यह उस समाज की तस्वीर है जो अभी भी लड़कियों और अनचाहे बच्चों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाया है। यह उस मां की कहानी दर्शाती है जिसके पास शायद न कोई सहारा था, न हिम्मत, न ही कोई रास्ता।
यह छोटा-सा शव हमें याद दिलाता है कि हम कितना कुछ बदलने से चूक रहे है।

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