अभिषेक मिश्रा

चासनाला । प्रिय मित्र और द टाइम्स ऑफ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार अनिल आशुतोष का असमय ही गोलोक प्रस्थान कर जाना दुखदायी है। उनकी आत्मा को शांति मिले, यही ईश्वर से प्रार्थना है। अनिल जी तेजी से बीमारी की चपेट में आते चले गए। अपने देश में, बीमारियों के विरूद्ध जंग में कई चुनौतियाँ हैं। जैसे, छोटे शहरों में सीमित स्वास्थ्य सेवाएँ और महानगरों में इलाज की ऊँची लागत। कहने के लिए तो केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक की कई योजनाएं हैं, जो इलाज में आर्थिक बाधाएं दूर कर सकती हैं। पर, उन योजनाओं का लाभ उठाना बेहद दुरूह कार्य है। शायद उनका भी अनुभव कुछ ऐसा ही रहा।

खैर, अखबारों के रिपोर्टर के तौर पर उर्वरक उद्योग को लेकर मेरी जितनी समझ बनी थी, उसमें अनिल जी की बड़ी भूमिका थी। वे तो इस विषय में “पीएचडी” कर चुके थे। उनकी उर्वरक उद्योग के नीतिगत मामलों की समझ अद्भुत थी। सिंदरी स्थित खाद कारखाना भारत सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र का प्रथम उद्यम था। अस्सी के दशक में इस कारखाने के जीर्णोद्धार के लिए आर्थिक पैकेज की सख्त जरूरत थी। तत्कालीन सांसद एके राय अपने स्तर से आर्थिक पैकेज की मांग कर रहे थे। अनिल जी ने पहली बार शोधपरक रिपोर्ट लिखकर राजनीतिज्ञों की मांग को पुख्ता आधार दिया था। उन्होंने 1988 में तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर बताया था कि तत्काल आर्थिक पैकेज न मिला तो पांच साल बाद दोगुना धन खर्च करके भी इसे जीवन दान देना संभव न हो सकेगा …..और जब 1992-93 में नरहिम्हाराव की सरकार ने भी आर्थिक पैकेज देने से मना कर दिया तो अनिल जी का अनुमान सही साबित हो गया। अटलबिहार वाजपेयी की सरकार को एक प्रकार से कहना पड़ा था कि अब गोइठा में घी सुखाने का कोई औचित्य नहीं।

अनिल जी बेहतर पत्रकार तो थे ही, अच्छे इंसान भी थे। श्रीमद्भगवतगीता का श्लोक है, “न जायते म्रियते वा कदाचिन्।” यानी आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। अनिल जी यादें हमारे बीच उनकी सूक्ष्म उपस्थिति बनाए रखेगी।

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